अपनी राजनीतिक गणित ठीक करने में जुटे नीतीश कुमार ?

हर बीतते दिन के साथ 2019 में होने वाले आम चुनावों की तस्वीर साफ होती चली जा रही है और बाकी नेताओं की तरह अब बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने इसे जीतने के लिए नया दांव चला है. तीसरे मोर्चे से जाति-धर्म में उलझे देश के नेता मुद्दों से कोसों दूर नज़र आते हैं और इसी तरह की राजनीति का हिस्सा बनते हुए नीतीश ने बिहार के जातिगत समीकरण को बदलने वाला एक अहम फैसला लिया है. महागठबंधन का साथ छोड़ एनडीए का दामन थामने वाले नीतीश ने पासवान को भी महादलित में शामिल करने का फैसला लिया है.

 

जाहिर सी बात है कि चुनाव मौसम में उन्होंने ये फैसला दलित वोटों को अपने पाले में करने के लिए लिया है. एलजेपी के रामविलास पासवान और हम पार्टी के जीतन राम मांझी बिहार में दलित राजनीति के दो चेहरे हैं. एक तरफ जहां पासवान बीजेपी नेतृत्व वाले गठबंघन एनडीए में हैं तो वहीं दूसरी तरफ बिहार के पूर्व सीएम मांझी लालू के साथ हैं और नीतीश के इस फैसले के साथ ही 2019 के चुनाव में दलित वोट किसके साथ जाएगा इसको लेकर जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू हो गई है.

 

आपको बता दें कि नए वोट बैंक की तलाश में नीतीश ने बिहार की सत्ता में आते ही दलितों को दलित और महादलित में बांट दिया था, जिसके बाद पासवान को छोड़कर तमाम दलित जातियां महादलित का हिस्सा थीं. महादलितों के विकास के लिए नीतीश कुमार ने कई योजनाएं शुरू कीं. नीतीश का ये प्रयोग सफल साबित हुआ और कई चुनावों में उन्हें इसका फायदा भी मिला.

 

तब रामविलास पासवान लालू के साथ थे जिसकी वजह से नीतीश ने पासवानों को वो सुविधाएं नहीं दीं जो महादलितों में शामिल बाकी जातियों को दी गईं. अब पासवान और नीतीश एक साथ हैं और ऐसे में इस फैसले के साथ ही दलित और महादलित का भेद खत्म होने जा रहा है.

आपको ये भी बता दें कि बिहार में दलितों की आबादी करीब 16 फीसदी है. वहीं दलितों में 22 अलग-अलग जातियां हैं और इनमें से पासवानों की संख्या चार फीसदी है.

दलितों में पासवान सबसे संपन्न और मजबूत जाति मानी जाती है. रामविलास पासवान अपनी जाति का वोट किसी भी तरफ ट्रांसफर कराने की ताकत रखते हैं. यही वजह है कि नीतीश ने पासवान को अपने साथ करने के लिए ये दांव चला है. नीतीश कुमार पासवान को भी महादलित में शामिल करने के फैसले का 14 अप्रैल को एलान कर सकते हैं. इस दिन नीतीश-रामविलास एक कार्यक्रम में साथ मौजूद होंगे.

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