दूसरा झरिया होने की ओर अग्रसर हो रहा है जामुड़िया का चुरुलिया

रिपोर्ट : रजत कबि
आसनसोल :  झारखंड के धनबाद स्थित झरिया कि एक कोयला खदान में लगी बरसों पुरानी आग आज भी धधक रही  है।  यही कारण है कि झरिया तथा आसपास के लोग आज भी दहशत के माहौल में जीने को विवश है । अब इस घटना की पुनरावृत्ति धनबाद से सटे पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्दवान जिले में भी देखने को मिल रही है । यहां आसनसोल के जामुड़िया स्थित चुरुलिया इलाके के एक कोयला खदान में लगी आग बुझने की बजाय दिन प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है।  एक बंद पड़े ओपन कास्ट कोल माईन उर्फ खुला मुह  कोयला खदान में लगी आग धीरे-धीरे आसपास के कोयले के ढेर को भी अपनी चपेट में लेती जा रही हैं । आलम यह है कि लगातार यह आग आसपास के इलाकों के लोगों के लिए दहशत  बनता जा रहा है।
 लोग जहां एक ओर यहां से निकलने वाले आगे से परेशान हैं।  वही इससे निकल रहा है धुआं लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है । ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड प्रबंधन द्वारा इस आग पर काबू पाया जाने संबंधित तरह-तरह के उपाय भी किए जा रहे हैं । लेकिन ये सभी उपाय अभी तक नाकाफ़ी ही साबित हुए हैं । कोयला दफ्तर के विभागीय अधिकारी कभी इस पर दमकल विभाग की मदद से से पानी डालने का प्रयास कर रहे हैं । तो कभी मिट्टी और बालू का ढेर से इसके मुहाने को बंद करने का प्रयास कर रहे हैं।  लेकिन ये सभी प्रयास आग की विकराल और भयावहता के सामने बौने साबित हो रहे हैं।  लगभग 7 दिन का समय बीत जाने के बाद भी इस आग पर काबू पाने के लिए किए जा रहे उपाय सिवाय इसे बढ़ाने के और कुछ भी साबित नहीं हो रहे हैं।
 अब इसीएल प्रबंधन द्वारा इस आग पर काबू पाये
जाने को लेकर एक पहल की शुरुआत की जा रही है । लेकिन जानकारों की माने तो इसे क्रियान्वित करने में महीनों तो दूर वर्षों तक का समय लग सकता है।  दरअसल  इलाके में सिंचाई व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए कई कैनल बनाए गए हैं।  इन कैनल से होकर जो पानी खेतों में पहुंचता है अब उसी पानी को इस कोयला खदान को भरे जाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।  कई सौ एकड़ में फैले इस खदान में पानी भरने के लिए इस प्रक्रिया से वर्षों का समय लग सकता है।  जो कहीं से भी सही साबित होता नहीं दिख रहा है।  इसीएल प्रबंधन अधिकारियों की माने तो वे इस खदान के जल स्तर को बढ़ाकर इतना ऊंचा करना चाहते हैं जो आग वाली जगह तक पहुंच सके और इसके बाद जल के संपर्क में आकर आग पर काबू पाया जा सके।  लेकिन इसके लिए ईसीएल प्रबंधन की यह पहल सही साबित होती नहीं दिख रही है।  बहरहाल  इलाके में रह रहे लोगों को अब इस बात का भय सताने लगा है कि उनके नीचे की जमीन और उसके नीचे दबा कोयला ज्वालामुखी का रूप धारण कर चुकी है।   जो कभी भी उनके और उनके परिवार के सामने ज्वालामुखी की तरह फट कर आफत ला सकती है।  यही कारण है कि इलाके के कई लोग लगातार यहां से पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं । यही नहीं इलाके के कई लोगों ने यहां से निकलते धुएं से फैलने वाली बीमारियों से बचने के लिए अन्यत्र जगहों पर जाकर शरण भी ले रखा है।  अब देखने वाली बात यह है कि जामुड़िया का यह चुरुलिया इलाका कहीं दूसरा झरिया बनता है अथवा उसे बनने से पहले ही रोक लिया जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: