राइट टू रिजेक्ट को न्यू इंडिया में जगह क्यों नहीं ?

 

 

“ देश में जनता को मतदान के अधिकार के साथ-साथ कई और मौलिक अधिकारों से लैस होना जरुरी है क्योंकि सत्ता की कमान जनता के हाथ में है इस बात का एहसास सत्ता को पूरे 5 साल होना चाहिए”

देश में न्यू इंडिया को लेकर कई तरह का कॉन्सेपट दिया जाता है. कई तरह के दावे वादे किए जाते है, पार्दशिता का वादा किया जाता है लेकिन राइट टू रिजेक्ट को लेकर न पिछली सरकार संजिदा दिखी न मौजूदा सरकार . इसमें मौजूदा सरकार को भी रखा इसलिए जा रहा है क्योंकि ये सरकार पार्दशिता, ईमानदारी, भ्रष्टाचार मुक्त भारत के दावे के साथ आई थी लेकिन बीते 4 सालों में सरकार ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं किया. आप सोच रहे होंगे राईट टू रिजेक्ट क्यों जरुरी है तो आप ये समझ लीजिए

“ देश में जनता को मतदान के अधिकार के साथ-साथ कई और मौलिक अधिकारों से लैस होना जरुरी है क्योंकि सत्ता की कमान जनता के हाथ में है इस बात का एहसास सत्ता को पूरे 5 साल होना चाहिए”

आगे बढ़ने से पहले आप समझिए राइट टू रिजेक्ट का मतलब क्या है ?

राइट दू रिजेक्‍ट का मतलब है अगर कोई व्यक्ति वोट देते समय मौजूदा उम्‍मीदवारों में से किसी को नहीं चुनना चाहता है तो वह ‘नान ऑफ दीज’ बटन का प्रयोग कर सकता है। इस अधिकार का अर्थ मतदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में वो सुविधा और अधिकार देना जिसका इस्तेमाल करते हुए वे उम्मीदवारों को नापसंद कर सकें। यदि मतदाता को चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं हो तो वह इस विकल्प को चुन सकता है।

भारतीय चुनाव अधिनियम 1961 की धारा 49-ओ के तहत संविधान में बताया गया है कि यदि कोई व्‍यक्ति वोट देते समय मौजूद उम्‍मीदवारों में से किसी को भी नहीं चुनना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है। यह उसका वोट देने या ना देने का अधिकार है। हालांकि ये धारा किसी प्रत्याशी को रिजेक्ट करने की अनु‍मति नहीं देती है। और इसी धारा को बदल कर अधिकारों को मजबूत करने की बात की जा रही है.

क्या होगा अगर पूरा अधिकार मिल गया तो ?

कानून के जानकारों के अनुसार राइट टू रिजेक्‍ट अगर लागू हो जाता है तो वोटर अपने वोट का सही प्रयोग कर सकते हैं। अगर लोकसभा क्षेत्र में ज्‍यादा से ज्‍यादा वोटर राइट टू रिजेक्‍ट बटन का प्रयोग करता है तो चुनाव आयोग राइट टू रिजेक्‍ट की संख्‍या ज्‍यादा होने की स्थिति में उस क्षेत्र के उम्‍मीदवारों का चुनावी पर्चा खारिज कर सकता है। राइट टू रिजेक्ट का प्रतिशत अधिक होने पर चुनाव खारिज हो जाता है। इसके लागू होने पर प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारियां जनता के प्रति और बढ़ जाती हैं। ऐसी स्थिति में वहां उपचुनाव कराया जा सकता है।

राजनीतिक दलों का क्या होगा ?

राइट टू रिजेक्‍ट लागू होने के बाद सभी दलों को अपने उम्‍मीदवारों का चयन करते समय काफी दबाव रहेगा और वे दागियों को चुनाव में टिकट देने से बचने का प्रयास करेंगे, जिससे राजनीति में साफ-सुथरी छवी वाले नेता आ सकते हैं। चुनाव के बाद भी जनप्रतिनिधियों पर अपने क्षेत्रों में ज्‍यादा से ज्‍यादा कार्य करने का दबाव होगा, नहीं तो अगले चुनाव में वोटर उन्‍हें रिजेक्‍ट कर सकते हैं।

आपको बता दें कि भारत में राइट टू रिकॉल की बात सबसे पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 4 नवंबर 1974 को संपूर्ण क्रांति के दौरान कही थी। ऐसा माना जाता है कि पुरातन समय में यूनान में एंथेनियन लोकतंत्र में राइट टू रिकॉल कानून लागू था।

‘’बतौर सीएम मोदी राइट टू रिजेक्ट के बारे में बात करते रहते है लेकिन जब पीएम की कमान उनके हाथ आई तो वो चुपचाप गद्दी पर बैठे है. राइट टू रिजेक्ट के पक्ष में आप पीएम मोदी को बतौर सीएम यू ट्यूब पर सुन सकते है.’’

आप इस बात को समझिए की आप अपने सांसद और विधायक को सुविधा, सैलरी, मकान देते है और वो बदले में आपके इलाके का विकास नहीं करके आपके साथ अपने किए वादे तोड़े तो उसे क्यों न उसके पद से बर्खाश्त कर दिया जाएं.

लेकिन पिछली सरकारों की तरह ये सरकार भी नागरिक अधिकारों को लेकर सजग नहीं दिखती है अगर सजग होती तो बीते 4 साल में बहुत कुछ हो सकता है लेकिन लगता है कि न्यू इंडिया के कॉन्सेप्ट में देश के नागरिकों के लिए राइट टू रिजेक्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं है.

 

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