सत्ता में आना सेटलमेंट नहीं है, पूर्व मुख्यमंत्रियों को खाली करना होगा बंगाला !

कहते है कि सत्ता सेटलमेंट दिला देती है, तभी तो एक बार चुनाव जीते तो बस जीवन पर सराकरी सुविधाओं के भोग करने का अधिकारी हासिल हो जाता है, जनता को कुछ मिले या ना मिले, नेता ने जनता के लिए कुछ किया हो या नहीं किया हो लेकिन हमारे देश की सियासत नेता को सुविधाओं से ऐसे लैस कर देती है कि सत्ता की चर्बी उनके आंखो पर चढ जाती है, ऐसी है एक फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने धत्ता बताते हुए आदेश दिया है कि यूपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने होगे… लोकप्रहरी नाम के एनजीओ की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को बड़ा झटका दिया है..यूपी में अभी मुलायम सिंह यादव, मायावती, अखिलेश यादव, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और एनडी तिवारी के पास लखनऊ में सरकारी बंगला है. सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि ये पूरी तरह से मनमाना है. अगर कोई पद छोड़ देता है उसके बाद भी उसे विशेष दर्जा देते हुए सराकरी बंगला दिया जाए तो ये समानता के अधिकार के खिलाफ है. नागरिकों में अलग अलग दर्जा नहीं बनाया जा सकता. ये आदेश सिर्फ उत्तर प्रदेश के कानून के खिलाफ है.

आपको ये भी जान लेना चाहिए की उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला देने के लिए एक नीति बनाई गई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में मनमाना बताते हुए रद्द कर दिया था. इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने दोबारा कानून बना दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की वैध्यता को भी खत्म कर दिया है .  लेकिन एक नजर  देखिए कैसे सत्ता जिनके पास जब जब रही उन्होने सेवाएं फिर लगातार ली और जनता के पैसे को अपने ऐशो आराम में खर्च कर दिया.

अगस्त 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का 13 माल एवेन्यू वाला सरकारी आवास मरम्मत के नाम पर 62 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए गए. वही जब अखिलेश मुख्यमंत्री थे तब उनके बंगले के रखरखाव पर हर साल करीब 13 करोड़ रुपए खर्च होते थे. वहीं पांच विक्रमादित्य मार्ग पर 10 साल में सरकार उसके रखरखाव पर 28 करोड़ रुपए खर्च .और भी कुछ बंगलों को मिला दें तो 7 आवासो पर 2 अरब रुपए खर्च कर दिए गए. इतनी रकम में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने हजारों लोगों को स्थाई रूप से नौकरी दी जा सकती थी.  नियमानुसार राज्य संपत्ति विभाग इन बंगलों की मरम्मत पर अधिकतम 25 लाख रुपये खर्च कर सकता है। इससे ज्यादा खर्च के लिए कैबिनेट की मंजूरी जरूरी है। लेकिन इसकी परवाह किसको है. मसलन ये सिर्फ एक राज्य तक ही सीमित नहीं है.

झारखंड जैसे राज्य में भी पिछले कुछ सालों में राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास पर सरकार के राजस्व से कुल 3,12, 45,714 रुपये खर्च हो चुके हैं. सबसे अधिक 1.62 करोड़ जेएमएम सुप्रीमो शिबू सोरेन के मोरहाबादी स्थित घर पर खर्च किये गये हैं. अर्जुन मुंडा के आवास पर 97.85 लाख रुपये से अधिक और झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी के आवास पर 52.38 लाख रुपये खर्च किये गये हैं.

मामला सिर्फ खर्च तक ही सीमित नहीं है नवंबर 2014 में राज्य संपत्ति विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में बताया कि मायावती पर 3.49 लाख, कल्याण सिंह पर 1.48 लाख और राजनाथ सिंह पर 15,000 रुपये का किराया बकाया था। दिवंगत CM राम प्रकाश गुप्ता के बंगले का भी 3.27 लाख किराया बाकी था.    मामला महज पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले तक ही सीमित नही है.. दरअसल नेता जब एक दिन के लिए भी सांसद या विधायक बनता है तो वो पेशंन का भागिदार हो जाता है जबकि ऐसे लाखों लोग है जो आजीवन नौकरी करते है लेकिन पेशंन नहीं पाते है . साल 2015 की एक रिपोर्ट कहती है कि एक सांसद पर हर महीने बतौर वेतन और भत्ते पर 2 लाख 70 हजार खर्च होते हैं. देश में कुल 790 सांसद हैं. इस हिसाब से 790 सांसदों के वेतन और भत्ते पर हर महीने 21 करोड़ 33 लाख रुपए खर्च होते हैं और हर साल 255 करोड़ 96 लाख. जबकि एक पूर्व सांसद को हर महीने 20 हजार रुपये पेंशन मिलती है. 5 साल से अधिक होने पर हर साल के लिए 1500 रुपये अलग से दिए जाते हैं.

अब आप अंदाजा लगाते रहिए की कौन और कितना किस रुप में जनता की सेवा करता है और सिस्टम के प्रति उसकी जवाबदारी कितनी हो जाती है …ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने एक राज्य को लेकर फैसला तो दे दिया है तो क्या दूसरे राज्य की सरकारे जिस नौतिकता का हवाला आए दिन देती है उसे क्या वो खुद पर लागू करेंगी.

 

 

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