कितना सटीक हो सकता है एक देश एक चुनाव ?

एक देश-एक चुनाव के मुद्दे को लेकर यूपी  ऐसा पहला राज्य है​ ​जिसने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है​ और ​रिपोर्ट तैयार कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दी गयी​ .यानि इसी के साथ एक बार फिर वन नेशन-वन इलेक्शन का कॉनसेप्ट बीजेपी शाषित राज्य में उछाल दिया, पीएम मोदी के निशानों पर चलते बीजेपी के मुख्यमंत्री पीएम मोदी के सपने को पूरा करने में जुटे हुए है लेकिन इसको लेकर सवाल भी कम नही है.  उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह की अगुवाई वाली 7 सदस्यीय समिति ने ‘एक देश एक चुनाव’ को लेकर जो रिपोर्ट सौंपी गई है उसमें कई तरह के सुझाव दिए गए है जिसके मुताबिक ये देश वन नेशन-वन इलेक्शन के तरफ बढ़ सकता है…

क्या कहती है योगी सरकार की रिपोर्ट ?

7 सदस्यों की समिति ने साल 2024 में एक देश एक चुनाव कराने का सुझाव दिया

अगला आम चुनाव दो चरणों में सभी राज्यों और देश में कराया जाएं

शहरी स्थानीय निकाय अध्यक्षों की तरह जिला पंचायत अध्यक्ष और क्षेत्र पंचायत प्रमुखों का चुनाव भी सीधे जनता से कराने की सिफारिश

फर्जी वोटिंग पर प्रभावी अंकुश के लिए वोटर लिस्ट को आधार से लिंक करने की सिफारिश

समिति ने कई अन्य देशों की चुनाव प्रणाली का अध्ययन करके ये रिपोर्ट बनाई है.

वहीं सरकार की आवाज से इतर विरोधी दलों की आवाज है..विरोधी दलों का कहना है कि ये राय तो सिर्फ एक पार्टी की है इसे देश की राय के तौर पऱ नहीं माना जा सकता है. लेकिन सवाल है कि वन नेशन वन एलेक्शन से किसका और कितना फायदा हो सकता है. क्योंकि देखा जाए तो देश हमेशा चुनावी मोड में ही रहता है और इसे कोई खारिज नहीं कर सकता, देखा जाए तो  देश में हर साल पांच से 6 राज्यों में चुनाव होते हैं। एक पोलिंग बूथ पर 50 हज़ार रुपए खर्च होते हैं। आम चुनाव 2014 का खर्च 40 हज़ार करोड़ रुपए था, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक हाल के चुनाव को देंखे तो गुजरात में बीजेपी और कांग्रेस का कुल अनुमानित खर्च 1750 करोड रुपए था, जबकि कर्नाटक में विभिन्न दलों के खर्च का ये आंकडा 10,000 करोड के आसपास पहुंच गया। जबकि ये खर्च 2013 के चुनाव की तुलना में दोगुना से अधिक है। केंद्र सरकार की ओर से ये कहा जा रहा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से तकरीबन 4,500 करोड़ रुपये की बचत होगी और उसके पीछे का तर्क ये है कि ये कोई पहली बार नही हो रहा है…1951-52, 1957, 1962 और 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ होते थे। लेकिन 1967 में राजनीतिक उथलपुथल के बाद परिस्थितियां बदल गईं और फिर चुनाव अलग-अलग होने लगें। तब से लेकर अब तक हर साल कई चुनाव होते हैं और सरकार का तर्क है कि इससे न सिर्फ विकास योजनाओं पर प्रतिकूल खर्च होता है बल्कि संसाधनों का भी गलत इस्तेमाल होता है..तो फिर सवाल है कि अगर सरकार तैयार है तो विपक्ष को वो कैसे अपने साथ ले पाएगी और सवाल ये भी है कि अगर सरकार को विपक्ष का साथ नहीं मिलता है तो फिर वन नेशन वन एलेक्शन का कॉन्सेपट कैसे सही तरीके से लागू हो पाएगा..क्योंकि विपक्ष इसे लोकतंत्र के मूड के खिलाफ मान रहा है….

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